प्राणायाम के प्रकार: जानिए स्वाभाविक, उदर, वक्ष, गर्दनी और योगिक श्वसन की विधियाँ


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प्राणायाम के प्रकार: जानिए स्वाभाविक, उदर, वक्ष, गर्दनी और योगिक श्वसन की विधियाँ

प्राणायाम  के प्रकार

  1. स्वाभाविक श्वसन,
  2. उदर श्वसन,
  3. वक्ष श्वसन,
  4. गर्दनी श्वसन,
  5. यौगिक श्वसन।

स्वाभाविक श्वसन करने की विधि

ज्ञान की किसी सुविधाजनक आसन में बैठ जाएं या श्वसन में लेट जाएं और पूरे शरीर को शिथिल करें। अपनी सहज और स्वाभाविक श्वसन प्रक्रिया का अवलोकन करें। श्वास के प्रवाह के प्रति पूर्ण रूप से सजग बनें। नासिका से आती-जाती श्वास के प्रभाव का अनुभव करें। श्वास पर किसी प्रकार का नियंत्रण न करें। ध्यान दें कि जब नासिका से श्वास भीतर जाती है, तब श्वास शीतल होती है और जब नासिका से श्वास बाहर आती है, तब श्वास गर्म होती है। दृष्टा भाव से इसका अवलोकन करें। श्वास प्रवाह के आने-जाने का अनुभव करें, जो गले के ऊपर, मुंह के पिछले भाग में हो रहा है। अब अपनी सजगता को गले के आसपास रखें और अनुभव करें कि श्वास गले से होकर प्रवाहित हो रही है। सजगता को और नीचे वक्ष स्थल में ले आएं और श्वास नालियों एवं वाहिकाओं में बहती हुई अनुभव करें। उसके बाद फेफड़ों में श्वास प्रवाह का अनुभव करें। फेफड़ों के फैलने और सिकुड़ने के प्रति सजग बनें। अब अपना ध्यान वक्ष पिंजर की ओर ले जाएं और इस क्षेत्र में विस्तार और संकुचन को मानसिक रूप से देखें। सजगता को नीचे उदर प्रदेश में ले आएं। अनुभव करें कि श्वास लेने पर उदर ऊपर की ओर उठता है और श्वास छोड़ने पर नीचे की ओर जाता है। अंत में, नासिका छिद्रों से उदर तक संपूर्ण श्वसन प्रक्रिया के प्रति सजग बन जाएं और कुछ समय तक आती-जाती श्वास को देखते रहें। अब अपनी सजगता को भौतिक शरीर पर वापस लाएं और उसे एक इकाई के रूप में देखें, फिर आंखें खोल लें।

उदर श्वसन

उदर श्वसन, श्वसन की सबसे स्वाभाविक एवं प्रभावी विधि है। तनाव, बैठने की त्रुटिपूर्ण स्थिति, कसे हुए वस्त्र और प्रशिक्षण की कमी के कारण हम प्रायः इसे भूल जाते हैं। एक बार पुनः यह विधि हमारे दैनिक जीवनचर्या का अंश बन जाए, तो हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार परिलक्षित होगा।

उदर श्वसन करने की विधि

श्वसन में लेट जाएं और पूरे शरीर को शिथिल करें। सहज श्वास के प्रति सजग रहें। उसे किसी प्रकार नियंत्रण में न लें। उसे पूरी तरह स्वाभाविक ही रहने दें। कुछ समय तक स्वाभाविक श्वास को मानसिक रूप से देखते रहें। दाहिने हाथ को नाभि के ठीक ऊपर पेट पर और बाएं हाथ को वक्ष के मध्य में रखें।
दाहिना हाथ श्वास लेने के साथ ऊपर और श्वास छोड़ने के साथ नीचे जाएगा, परंतु बायां हाथ श्वास के साथ नहीं हिलना चाहिए। उदर में किसी प्रकार का तनाव न रहे। किसी भी प्रकार से बल प्रयोग न करें। वक्ष को फैलाने का प्रयास न करें और न ही कंधों को हिलाएं-डुलाएं। अनुभव करें कि उदर फैल और सिकुड़ रहा है। धीमा और गहरा श्वसन करते रहें। उदर को जितना संभव हो, फैलाते हुए श्वास लें, किंतु वक्ष पिंजर को न फैलाएं। पूरक के अंत में मध्यपटल उदर को दबाएगा और नाभि उसमें उच्चतम बिंदु पर होगी। रेचक के समय मध्यपटल ऊपर की ओर जाता है और उदर नीचे की ओर जाता है। रेचक के अंत में उदर संकुचित हो जाता है और नाभि मेरुदंड की ओर दब जाती है। कुछ मिनटों तक इस अभ्यास को जारी रखें।

वक्ष श्वसन

इसका संबंध प्रायः शारीरिक व्यायाम और परिश्रम, तथा साथ ही दबाव और तनाव से भी रहता है। इस स्थिति में यह शरीर को अधिक ऑक्सीजन प्राप्त करने में सहायक होता है। ऐसा देखा गया है कि तनावपूर्ण स्थिति के टल जाने के बाद भी कई लोगों में इस प्रकार के श्वसन को जारी रखने की प्रवृत्ति हो जाती है, जिसके फलस्वरूप गलत श्वसन विधि की आदत हो जाती है और तनाव बना रहता है।

वक्ष श्वसन करने की विधि

ज्ञान के किसी आसन में बैठ जाएं या श्वसन में लेट जाएं और पूरे शरीर को शिथिल करें। वक्ष के दोनों भागों पर ध्यान केंद्रित करते हुए कुछ समय के लिए अपनी स्वाभाविक श्वास को सजगता पूर्वक देखें और उसे अनवरत चलने दें। मध्यपटल का उपयोग बिल्कुल बंद कर दें और वक्ष को धीरे-धीरे फैलाकर उसमें सांस लेना प्रारंभ कर दें। प्रत्येक पसली की बाहर और ऊपर की ओर होने वाली गति का अनुभव करें और इस फैलाव से फेफड़ों में भरने वाली वायु के प्रति भी सजग हो जाएं। वक्ष को अधिक से अधिक फैलाएं।
श्वास छोड़ते हुए वक्ष की पेशियों को शिथिल करें। अनुभव करें कि वक्ष सिकुड़ कर फेफड़ों से वायु को बाहर निकाल रहा है। पूर्ण सजगता के साथ वक्ष से धीरे-धीरे गहरी सांस लें। मध्यपटल का उपयोग न करें। प्रत्येक श्वास के बाद थोड़ा विश्राम करें और कुछ देर इस प्रक्रिया को जारी रखें।

गर्दनी श्वसन

इसमें श्वास लेते समय फेफड़े का अधिकतम विस्तार होता है और इससे फेफड़ों के ऊपरी भाग में ही वायु का प्रवेश हो पाता है। दैनिक जीवन में कठोर शारीरिक श्रम और दमा जैसी वायुपथ रोधी बीमारियों की अवस्था में ही गर्दनी श्वसन का उपयोग होता है।

गर्दनी श्वसन करने की विधि

श्वसन में लेट जाएं और पूरे शरीर को शिथिल करें। कुछ मिनट तक वक्ष श्वसन करें। वक्ष पिंजर को पूरी तरह फैलाएं और श्वास भरें। जब पसलियां पूरी तरह फैल जाएं, तब थोड़ी और सांस लें, जब तक कि गर्दन के मूल के चारों ओर फेफड़ों के ऊपरी भाग में फैलाव का अनुभव न होने लगे। कंधे और पसली भी थोड़ा ऊपर की ओर उठें। इसके लिए थोड़ा प्रयत्न करना होगा। धीरे-धीरे रेचक करें। पहले गर्दन के निचले भाग और वक्ष के ऊपरी भाग को खाली करें। फिर वक्ष पिंजर के शेष भाग को शिथिल कर प्रारंभिक स्थिति में ले आएं। इस प्रकार कुछ और श्वास लें और इस प्रकार के श्वसन के प्रभाव का अनुभव करें।

योगिक श्वसन

इसका अभ्यास किसी भी समय किया जा सकता है। उच्च तनाव या क्रोध की स्थितियों में स्नायु को शांत करने के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। दैनिक योगाभ्यास में इसको जोड़ लेना स्वाभाविक श्वसन क्रिया में सुधार लाता है और श्वसन में गहराई आती है, किंतु निरंतर योग श्वसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए।

योगिक श्वसन करने की विधि

ज्ञान के किसी आसन में बैठ जाएं या श्वसन में लेट जाएं और पूरे शरीर को शिथिल करें। धीमी और हल्की, गहरी सांस भीतर लें और पूरी तरह से पेट को फैलाएं। श्वास धीरे-धीरे लेने का प्रयास करें। श्वास की आवाज ना सुनाई दे। अनुभव करें कि हवा फेफड़ों के निचले भाग में जा रही है और पेट में फैलाव हो रहा है। फिर वक्ष को भी बाहर और ऊपर की ओर फैलना प्रारंभ कर दें। जब पसलियां पूरी तरह से फैल जाएं, तब थोड़ी और सांस लें, जब तक कि गर्दन के निचले भाग के चारों ओर फेफड़ों के ऊपरी भाग में फैलाव का अनुभव न हो। पसली और कंधे भी थोड़े ऊपर की ओर उठने चाहिएं। गर्दन की पेशियों में थोड़े तनाव का अनुभव करें। शरीर को बिल्कुल शिथिल छोड़ दें। अनुभव करें कि फेफड़ों के ऊपरी भाग में वायु भर रही है। यह एक संपूर्ण, पूरी हुई प्रक्रिया एक सतत गति के रूप में होनी चाहिए।

श्वसन का हर चरण दूसरे चरण में इस प्रकार मिल जाए कि दोनों के बीच कोई अंतराल अनुभव न हो। प्रक्रिया के बीच में कोई झटका या अनावश्यक तनाव नहीं होना चाहिए। श्वसन सागर की लहरों के उतार-चढ़ाव की तरह होना चाहिए। अब श्वास छोड़ना शुरू करें। सबसे पहले गर्दन के निचले भाग और वक्ष के ऊपरी भाग को शिथिल करें। उसके बाद वक्ष को नीचे की ओर और फिर भीतर की ओर संकुचित होने दें। इसके बाद मध्यपटल को ऊपर और फिर उदर को वक्ष की ओर आने दें। उदर की दीवार को मेरुदंड के अधिक से अधिक निकट खींचकर, बिना अधिक जोर लगाए फेफड़ों को अधिक से अधिक खाली करने का प्रयास करें। संपूर्ण गतिविधि सामंजस्यपूर्ण और लयबद्ध होनी चाहिए। श्वास बाहर छोड़ने के बाद कुछ देर के लिए कुंभक करें। यह योगिक श्वसन का एक चक्र पूरा हुआ। प्रारंभ में आप इसे 5 से 10 चक्र करें और फिर धीरे-धीरे बढ़ाकर प्रतिदिन 10 मिनट तक ले जाएं।

निष्कर्ष

प्रायः सभी प्राणायाम में योगिक श्वसन का उपयोग किया जाता है। ध्यान देने योग्य मुख्य बात यह है कि श्वसन आरामदायक और विश्रामपूर्वक होना चाहिए। बाद में जब सजगता और श्वसन प्रक्रिया पर नियंत्रण स्थापित हो जाए, तब असली श्वसन छोड़कर योगिक श्वसन के उदर श्वसन और वक्ष श्वसन का योग होता है। श्वास प्रवाह स्वाभाविक होना चाहिए। किसी प्रकार का जोर नहीं लगना  चाहिए।

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प्राणायाम योग का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। महर्षि पतञ्जलि ने योग के आठ अंग बताए हैं, जिनमें चौथा अंग प्राणायाम है। “प्राण” का अर्थ है जीवन ऊर्जा और “आयाम” का अर्थ है विस्तार। इस प्रकार प्राणायाम का अर्थ हुआ – श्वास-प्रश्वास की प्रक्रिया द्वारा जीवन ऊर्जा का विस्तार करना। श्वास केवल ऑक्सीजन लेने और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ने की क्रिया नहीं है, बल्कि यह हमारे शरीर, मन और आत्मा को जोड़ने वाली सेतु है।

प्राणायाम के अनेक प्रकार हैं – जैसे भस्त्रिका, कपालभाति, अनुलोम-विलोम, भ्रामरी आदि। लेकिन यहाँ हम पाँच मूलभूत श्वसन विधियों पर ध्यान देंगे:

  • स्वाभाविक श्वसन
  • उदर श्वसन
  • वक्ष श्वसन
  • गर्दनी श्वसन
  • योगिक श्वसन

1. स्वाभाविक श्वसन

  • परिभाषा: यह वही श्वसन है जो हम सामान्यतः करते हैं। इसमें कोई विशेष तकनीक नहीं होती।
  • विधि:
    • आराम से बैठें या लेटें।
    • श्वास को बिना किसी प्रयास के आने-जाने दें।
    • ध्यान दें कि श्वास स्वतः ही भीतर जाती और बाहर आती है।
  • लाभ:
    • मन को शांत करता है।
    • शरीर को प्राकृतिक लय में रखता है।
    • शुरुआती साधकों के लिए आधारभूत अभ्यास है।

2. उदर श्वसन

  • परिभाषा: इसमें श्वास लेते समय पेट बाहर की ओर फैलता है और छोड़ते समय भीतर की ओर सिकुड़ता है।
  • विधि:
    • आरामदायक आसन में बैठें।
    • एक हाथ पेट पर रखें।
    • गहरी श्वास लें, पेट को बाहर की ओर फैलाएँ।
    • श्वास छोड़ते समय पेट को भीतर खींचें।
  • लाभ:
    • फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है।
    • पाचन तंत्र को सुदृढ़ करता है।
    • तनाव और चिंता कम करता है।

3. वक्ष श्वसन

  • परिभाषा: इसमें श्वास लेते समय छाती का विस्तार होता है।
  • विधि:
    • सीधे बैठें।
    • श्वास लेते समय छाती को फैलाएँ और पसलियों को ऊपर उठाएँ।
    • श्वास छोड़ते समय छाती को ढीला छोड़ दें।
  • लाभ:
    • हृदय और फेफड़ों को मजबूती देता है।
    • रक्त संचार को बेहतर करता है।
    • शारीरिक ऊर्जा में वृद्धि होती है।

4. गर्दनी श्वसन

  • परिभाषा: इसमें श्वास लेते समय गर्दन और कंधे ऊपर उठते हैं।
  • विधि:
    • सीधे बैठें।
    • श्वास लेते समय कंधों और कॉलर बोन को ऊपर उठाएँ।
    • श्वास छोड़ते समय उन्हें नीचे लाएँ।
  • लाभ:
    • ऊपरी फेफड़ों को सक्रिय करता है।
    • श्वसन तंत्र की जकड़न को कम करता है।
    • आपातकालीन स्थिति में उपयोगी है जब गहरी श्वास लेना कठिन हो।

5. योगिक श्वसन

  • परिभाषा: यह सबसे पूर्ण श्वसन है जिसमें उदर, वक्ष और गर्दनी – तीनों श्वसन विधियों का संयोजन होता है।
  • विधि:
    • आराम से बैठें।
    • पहले पेट को फैलाते हुए श्वास लें।
    • फिर छाती को फैलाएँ।
    • अंत में कंधों और गर्दन को ऊपर उठाएँ।
    • श्वास छोड़ते समय क्रमशः गर्दन, छाती और पेट को ढीला करें।
  • लाभ:
    • शरीर में अधिकतम ऑक्सीजन पहुँचती है।
    • मन और शरीर दोनों को संतुलित करता है।
    • ध्यान और एकाग्रता को बढ़ाता है।
    • संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।

निष्कर्ष

प्राणायाम केवल श्वास की तकनीक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की कला है। स्वाभाविक श्वसन हमें सहजता सिखाता है, उदर श्वसन पाचन और शांति देता है, वक्ष श्वसन ऊर्जा और रक्त संचार को बढ़ाता है, गर्दनी श्वसन ऊपरी फेफड़ों को सक्रिय करता है और योगिक श्वसन हमें पूर्णता की ओर ले जाता है।

लगातार अभ्यास से शरीर स्वस्थ, मन शांत और आत्मा प्रसन्न रहती है। यही योग का वास्तविक उद्देश्य है – शरीर, मन और आत्मा का सामंजस्य।

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