यद्यपि श्वास द्वारा ली जाने वाली वायु से इसका घनिष्ठ संबंध है, फिर भी यह वायु या ऑक्सीजन से कहीं अधिक सूक्ष्म है

प्राणायाम का परिचय: अर्थ, महत्व और श्वास पर नियंत्रण की योगिक विधि

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प्राणायाम का परिचय: अर्थ, महत्व और श्वास पर नियंत्रण की योगिक विधि

प्राणायाम के चार चरण

प्राणिक शरीर

प्राण

अपान

समान

उदान

व्यान

श्वास, स्वास्थ्य और प्राणायाम

स्वसन और जीवनकाल

अभ्यासियों के लिए सामान्य निर्देश

श्वसन

अभ्यास का समय

अभ्यास का स्थान

बैठने का आसन

क्रम

वस्त्र

स्नान

निष्कर्ष (Conclusion):

प्राणायाम का परिचय अर्थ, महत्व और श्वास पर नियंत्रण की योगिक विधि
यद्यपि श्वास द्वारा ली जाने वाली वायु से इसका घनिष्ठ संबंध है, फिर भी यह वायु या ऑक्सीजन से कहीं अधिक सूक्ष्म है

सामान्य रूप से प्राणायाम की परिभाषा श्वास पर नियंत्रण के रूप में की जाती है, यद्यपि अभ्यासन की दृष्टि से यह व्याख्या सही हो सकती है, परंतु यह प्राणायाम केसंपूर्ण अर्थ को प्रकट नहीं करती। प्राणायाम शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है — प्राण और आयाम। प्राण का अर्थ होता है जीवनी शक्ति या प्राण शक्ति। यह वह शक्ति है जो समस्त सजीव और निर्जीव पदार्थ में विद्यमान है। यद्यपि श्वास द्वारा ली जाने वाली वायु से इसका घनिष्ठ संबंध है, फिर भी यह वायु या ऑक्सीजन से कहीं अधिक सूक्ष्म है। इसीलिए प्राणायाम को फेफड़ों में अतिरिक्त ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए किया जाने वाला स्वसन व्यायाम नहीं समझना चाहिए। प्राणायाम में श्वसन का उपयोग प्राण में कोर्स की नदियों में प्राण प्रभाव को प्रभावित करने के लिए किया जाता है। प्राणायाम, स्वसन क्रिया के माध्यम से मानव संरचना के स्थूल व सूक्ष्म स्तरों में निहित सभी प्रकार के प्राणों को संचालित व नियंत्रित करता है। इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव मन व शरीर पर भी पड़ता है। प्राणायाम का परिचय यह बताता है कि यह केवल श्वास पर नियंत्रण नहीं, बल्कि जीवन ऊर्जा के संचालन की विधा है। 

प्राणायाम के चार चरण

 प्राणायाम के अभ्यास को चार चरणों में किया जाता है —

  1. पूरक, या श्वास अंदर लेना 
  2. रेचक, या श्वास बाहर छोड़ना 
  3. अंतःकुंभक, या श्वास अंदर रोकना 
  4. बहिःकुंभक, या श्वास बाहर रोकना 

प्राणायाम करते समय जब हम श्वास भीतर ले जाते हैं, उसे पूरक कहते हैं। जब श्वास भीतर ही रोक लेते हैं, उसे अंतःकुंभक कहते हैं। जब श्वास बाहर छोड़ते हैं, उसे रेचक कहते हैं, और जब श्वास बाहर रोकते हैं, उसे बहिःकुंभक कहते हैं। “प्राणायाम का परिचय समझने के लिए हमें इसके चार प्रमुख चरणों को जानना आवश्यक है।

प्राणिक शरीर

  • योग शरीर विज्ञान के अनुसार, मनुष्य का शरीर पांच कोषों से मिलकर बना है, जो मानव अस्तित्व के विविध पक्षों या आयाम के लिए उत्तरदायी हैं। यह पांच कोष निम्नलिखित हैं —
  1. अन्नमय कोष 
  2. मनोमय कोष 
  3. प्राणमय कोष 
  4. विज्ञानमय कोष 
  5. आनंदमय कोष 

यद्यपि ये पांचों कोष एक साथ कार्य कर एक संपूर्ण इकाई गठित करते हैं, फिर भी प्राणायाम के अभ्यासन में मुख्य रूप से प्राणमय कोष पर ही कार्य किया जाता है। प्राणमय कोष पाँच प्रमुख प्राणों से मिलकर बना है, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘पंच प्राण’ कहा जाता है —

  1. प्राण
  2. अपान
  3. समान
  4. उदान
  5. व्यान
    जब हम प्राणायाम का परिचय विस्तार से करते हैं, तो प्राणमय शरीर की समझ आवश्यक हो जाती है।

प्राण

 यह ब्राह्मणी प्राण नहीं, बल्कि प्राणमय कोष का केवल एक अंश है, जो कंठनली तथा मध्यापत के बीच के क्षेत्र को नियंत्रित करता है। यह श्वसन और वाणी संबंधी अंगों, तथा अन्य नलिकाओं एवं इन्हें क्रियाशील बनाने वाली पेशियों और तंत्रिकाओं से संबंधित है। यही वह शक्ति है, जिसके द्वारा श्वास भीतर खींची जाती है।

अपान

 यह नाभि प्रदेश के नीचे स्थित है। यह बड़ी आंत, गुर्दों, मलाशय और मूत्राशय को ऊर्जा प्रदान करता है। इसका संबंध शरीर से अपशिष्ट पदार्थों के निष्कासन से है।

समान

यह हृदय और नाभि के बीच स्थित है। यह पाचन तंत्र, यकृत, आमाशय, अग्नाशय तथा उनके स्राव को सक्रिय बनाता है और उन पर नियंत्रण करता है। समान, हृदय और रक्त संचरण प्रणाली को भी सक्रिय बनाता है और यह पोषक तत्वों के पाचन और वितरण के लिए उत्तरदायी है।

उदान

 यह सभी संवेदी ग्राहकों, जैसे नेत्रों, नाक और कानों को सक्रिय बनाकर शरीर में गले से ऊपर के क्षेत्र को नियंत्रित करता है। इसके बिना बाह्य जगत के विचार और चेतना की अनुभूति संभव नहीं है। उदान, शरीर के अंगों और उनमें संबंध मांसपेशियों, स्नायु, तंत्रिकाओं और संधियों के बीच सामंजस्य लाता है और उन्हें सक्रिय बनाता है।

व्यान

 यह संपूर्ण शरीर में व्याप्त है। यह शरीर की समस्त गतिविधियों को नियमित और नियंत्रित करता है, और अन्य प्राणों के बीच समन्वय स्थापित करता है। यह अन्य प्राणों के लिए आरक्षित प्राण शक्ति की भूमिका भी निभाता है।

श्वास, स्वास्थ्य और प्राणायाम

 श्वास, शरीर की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यह प्रत्यक्ष कोशिका के कार्यकलाप को प्रभावित करती है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह मस्तिष्क के कार्य से भी घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है। मानव प्रति मिनट 15 बार और प्रतिदिन 21600 बार सांस लेता है। श्वसन, ऑक्सीजन और ग्लूकोज के दहन के लिए ईंधन प्रदान करता है, जिससे प्रत्येक पेशी संकुचन, ग्रंथि स्राव और मानसिक क्रिया के संतुलन हेतु ऊर्जा का उत्पादन होता है।

स्वास्थ्य का मानवीय अनुभूति के सभी पक्षों से घनिष्ठ संबंध है। अधिकतर लोग अपने फेफड़ों की क्षमता के थोड़े ही भाग का उपयोग कर, गलत ढंग से श्वसन करते हैं। पूर्ण, गहरा और धीमा श्वसन मन की शांति, संतोषपूर्ण अवस्था को प्रेरित करता है और स्वयं भी इससे प्रेरित होता है। अनियमित श्वसन, मस्तिष्क के सामंजस्य को भंग कर देता है, जिससे शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक अवरोध उत्पन्न होते हैं। यद्यपि श्वसन मुख्यतः एक अचेतन प्रक्रिया है, परंतु किसी भी समय इस पर सचेतन नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। परिणामस्वरूप, यह मन के चेतन और अचेतन क्षेत्र के बीच सेतु का निर्माण करता है। विक्षिप्त और चेतन मन में अवरुद्ध ऊर्जा को प्राणायाम के अभ्यास द्वारा अधिक रचनात्मक और आनंददायक कार्यों में उपयोग के लिए मुक्त किया जा सकता है।

स्वसन और जीवनकाल

 स्वसन की लयबद्धता से जीवन की गुणवत्ता के अतिरिक्त, उसकी दीर्घता भी प्रभावित होती है। प्राचीन योगियों एवं ऋषियों ने बड़े विस्तार से प्रकृति का अध्ययन किया। उन्होंने देखा कि मंद-मंद सांस लेने वाले पशु, जैसे — अजगर, हाथी और कछुआ दीर्घजीवी होते हैं, जबकि तीव्र गति से सांस लेने वाले प्राणी, जैसे — पक्षी, कुत्ते और खरगोश अल्पजीवी होते हैं।

इस अवलोकन के द्वारा उन्होंने मानव जीवन की अवधि को बढ़ाने के लिए मंद श्वसन की महत्ता को समझा। जो लोग जल्दी-जल्दी सांस लेते हैं, उनकी आयु, ऐसे लोगों से कम होने की संभावना रहती है, जो मंद और गहरा श्वसन करते हैं।

शारीरिक स्तर पर इसका कारण यह है कि श्वसन का प्रत्यक्ष संबंध हृदय से है। मंद स्वसन दर, हृदय को मजबूत और स्वस्थ बनाए रखती है और दीर्घ जीवन का अवसर प्रदान करती है। गहरा श्वसन, प्राणमय कोष द्वारा ऊर्जा के अवशोषण में वृद्धि करता है, जिसके फलस्वरूप क्रियाशीलता, प्राण शक्ति और सामान्य स्वास्थ्य में वृद्धि होती है।

अभ्यासियों के लिए सामान्य निर्देश

प्राचीन ग्रंथों में प्राणायाम के संबंध में असंख्य नियम और निर्देश दिए गए हैं। मुख्य बातें हैं — आंतरिक और बाह्य चिंतन एवं रहन-सहन में संयम, संतुलन और समझदारी का व्यवहार। किंतु जो लोग प्राणायाम के उच्च अभ्यास करना चाहते हैं, उनके लिए किसी गुरु या कुशल योग शिक्षक का मार्गदर्शन आवश्यक है।

श्वसन

सदा नाक से श्वास लें, मुंह से कदापि नहीं। विशेष रूप से निर्देश प्राप्त होने पर ही मुंह से सांस लेनी चाहिए। अभ्यास प्रारंभ करने के पूर्व, नियमित रूप से जलनेति द्वारा नासिका छिद्रों को स्वच्छ कर लेना चाहिए। पूरे अभ्यास के दौरान, नासिका छिद्रों के प्रति सजग रहना चाहिए।

अभ्यास का समय

प्राणायाम के अभ्यास के लिए सर्वोत्तम समय प्रातःकाल है, जब शरीर तरोताजा रहता है और मन में बहुत कम विचार तरंगें रहती हैं। यदि प्रातःकाल समय निकालना संभव न हो, तो दूसरा उत्तम समय सूर्यास्त के तुरंत बाद का है।

अभ्यास का स्थान

अभ्यास शांत, स्वच्छ और सुखदायक कमरे में करना चाहिए, जिसमें स्वच्छ वायु का प्रवेश हो और जो बहुत अधिक हवादार भी न हो।

बैठने का आसन

अभ्यास के समय अवधूत श्वसन एवं शारीरिक स्थिरता प्राप्त करने के लिए, ध्यान के किसी आरामदायक स्थिर आसन में बैठने की आवश्यकता होती है। सिद्धासन, सिद्ध योग में प्राणायाम के लिए सर्वोत्तम आसनों में से एक है। अभ्यास की अवधि में शरीर अधिक से अधिक शिथिल रहना चाहिए, साथ ही मेरुदंड, गर्दन और सिर एक सीध में रहें।

क्रम

आसनों के पश्चात और ध्यान से पूर्व प्राणायाम करना चाहिए। प्राणायाम के बाद कुछ मिनटों के लिए शवासन में लेटना चाहिए।

वस्त्र

अभ्यास के दौरान ढीले-ढाले, आरामदायक, कृत्रिम रेशों से बने वस्त्र ही धारण करने चाहिए। ठंडे मौसम में शरीर को एक चादर या कंबल से ढक लेना चाहिए।

स्नान

अभ्यास प्रारंभ करने के पूर्व स्नान कर लेना चाहिए, या कम से कम हाथ-पैर और मुंह अवश्य ही धो लेना चाहिए। अभ्यास के आधे घंटे बाद तक स्नान नहीं करना चाहिए।

निष्कर्ष (Conclusion):

प्राणायाम केवल श्वास को नियंत्रित करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह हमारे शरीर, मन और आत्मा के बीच सामंजस्य स्थापित करने की एक शक्तिशाली योगिक पद्धति है। यह जीवन ऊर्जा (प्राण) को जागृत कर शरीर के सूक्ष्म स्तरों पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। नियमित और सही तरीके से प्राणायाम का अभ्यास न केवल मानसिक शांति प्रदान करता है, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य, ऊर्जा और दीर्घायु का भी आधार बनता है। अतः योग साधना में प्रवेश करने से पूर्व प्राणायाम का सही ज्ञान और अभ्यास अत्यंत आवश्यक है। इस प्रकार, प्राणायाम का परिचय हमें न केवल श्वास क्रिया बल्कि मानसिक, शारीरिक और आत्मिक ऊर्जा से जोड़ता है।

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